09 December 2017

शिक्षण विधियां-प्रयोजना विधि या प्रोजेक्ट विधि teaching method-project method

 शिक्षण विधियां Teaching methods

प्रायोजना विधि Project method

इस विधि का विकास अमेरिका में हुआ। परियोजना विधि के प्रणेता जॉन डीवी थे। प्रायोजना विधि शिक्षा दर्शन की एक प्रमुख विचारधारा प्रयोजनवाद पर आधारित है। तथा इस विधि के जन्मदाता w h किल पैट्रिक है।
प्रायोजना विधि में बालक अपने अनुभव के आधार पर सीखते हैं। उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने विचारने का अवसर प्राप्त होता है तथा उनका शारीरिक और मानसिक विकास होता है।
किल पैट्रिक-"प्रोजेक्ट वह उद्देश्य पूर्ण कार्य है जिसे लगन के साथ सामाजिक वातावरण में किया जाता है।"
पारकर-"यह क्रिया की एक इकाई है जिसमें विद्यार्थियों को योजना और उद्देश्य निर्धारित करने के लिए उत्तरदाई बनाया जाता है।"
स्टीवेंसन-"प्रोजेक्ट एक समस्या मूलक कार्य है जिसे स्वाभाविक परिस्थितियों में पूर्ण किया जाता है"।
बेलार्ड-"प्रोजेक्ट यथार्थ जीवन का ही एक भाग है जो विद्यालय में प्रदान किया गया है"।
        उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रोजेक्ट विधि विद्यार्थियों के वास्तविक जीवन से संबंधित किसी समस्या का हल खोज निकालने के लिए अच्छी तरह से चुना हुआ वह कार्य है जिसे पूर्ण स्वाभाविक परिस्थितियों में सामाजिक वातावरण में ही पूर्ण किया जाता है।
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प्रायोजना विधि की कार्यप्रणाली (working process of project method)-

     प्रायोजना विधि को सुचारु रुप से चलाने के लिए निम्न पदों में विभक्त किया जा सकता है-

1. कार्यक्रम (Planning)-

       प्रायोजना की सफलता व असफलता इस पद पर निर्भर करती है। शिक्षक को वाद विवाद के माध्यम से योजना के विभिन्न पक्षों से संबंधित कार्यक्रम सुचारु रुप से बना लेना चाहिए। उसी के अनुसार दायित्व का विभाजन करना चाहिए।

2. प्रस्थिति प्रदान करना(provision of a situation)-

      विद्यार्थियों की आयु ,इच्छाओं एवं योग्यताओं को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षक को चाहिए कि वह ऐसी स्थिति छात्रों के सम्मुख उत्पन्न कर दें, जिस में छात्रों को रुचि हो जाए तथा उसमें निहित समस्या की ओर उनका ध्यान केंद्रित हो जाए।

3. क्रियान्वयन execution-

      प्रत्येक छात्र की योग्यता प्रकृति, रुचि एवं क्षमता के अनुरूप उसे दायित्व दिया जाना चाहिए। जिससे वह योजना की पूर्णता मैं कुछ योगदान दे सके। शिक्षक को अप्रत्यक्ष रुप से योजना के प्रत्येक प्रश्न पर ध्यान देना चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर मार्गदर्शन करना चाहिए।

4. योजना के उद्देश्य एवं चयन selection and objective of project-

     योजना का उपयुक्त चयन सफलता की एक आवश्यकता है शिक्षक को अप्रत्यक्ष रुप से छात्रों को उपयुक्त योजना के चयन हेतु मार्गदर्शन करना चाहिए, तभी वह अधिक उपयोगी हो सकती है। इसके बाद उसी से संबंधित उद्देश्य छात्रों के सामने स्पष्ट कर देना चाहिए,जिससे वह अपनी शक्तियों का वंचित रूप से मार्गकारण कर सकें।

5. मूल्यांकन evolution-

     योजना की समाप्ति पर शिक्षकों एवं छात्रों द्वारा सारे कार्य का मूल्यांकन किया जाता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है। यदि योजना में कोई तृप्ति रह गई हो तो उसे खोजने का प्रयास किया जाना चाहिए । छात्रों को समय में अपने कार्यों की समा योजना करनी चाहिए।

6. कार्य लेख recording-

     प्रत्येक छात्र को अपनी क्रियाओं का विवरण रखना होता है। जो धातु रूप से सौंपा गया है उससे संबंधित सब लेखा जोखा उसे रखना होता है। शिक्षक उस का निरीक्षण करता है तथा यह जानने का प्रयास करता है कि छात्र अपना उत्तरदायित्व कितना निभा रहा है। संपूर्ण योजना का एक पूर्ण विवरण भी रखा जाता है।

प्रायोजना विधि के लाभ/गुण-Benefits / Properties of the Project Method-

➭इस विधि द्वारा बालक व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त करते हैं जो उनके भावी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
➭इसमें सभी विषयों के ज्ञान को संबोधित किया जाता है।
➭यह विधि बालक में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, नेतृत्व और भावनात्मक स्थिरता आदि का विकास करती है।
➭इस विधि में बालकों को यह स्वतंत्रता होती है कि वह अपनी रुचि के अनुसार योजना का चुनाव करें। यहां समय चक्र का कोई प्रतिबंध नहीं होता है।
➭जो भी समस्या ली जाती है वह वास्तविक होती है इसके द्वारा बालक जीवन की नवीन परिस्थितियों से अवगत होते हैं।
➭प्रयोजना विधि में बालक सदैव क्रियाशील रहते हैं। क्रियाशीलता के कारण बालक में जिज्ञासा,चिंतन तथा संग्रह करने की आदतों का विकास होता है।
➭इस विधि के माध्यम से बालकों में सहयोग व सद्भाव का विकास होता है क्योंकि इस विधि में बालक समूह में रहकर कार्य करते हैं।
➪इस विधि में बाल केंद्रित शिक्षा पर बल दिया जाता है। बालक की रुचियों, मनोवृत्तियों और मनोभावों का ध्यान रखा जाता है।
➩छात्रों के निरंतर क्रियाशील रहने से उनकी व्यवहार कुशलता में वृद्धि होती है।

प्रायोजना विधि के दोष-Defect of the project method-

➭प्रायोजना विधि के प्रयोग से पाठ्यक्रम को समय पर समाप्त नहीं किया जा सकता है।
➭इस विधि में समय अधिक खर्च होता है।
➭प्रायोजना में प्रशिक्षित अध्यापको व संदर्भ पुस्तकों का अभाव होता है।
पूर्ण स्वतंत्रता देने से अच्छे परिणाम नहीं आते।
➭प्रत्येक विद्यालय के लिए यह संभव नहीं है।
➭यह विधि दूसरी विधियों की अपेक्षा अधिक महंगी विधि है क्योंकि इसमें काफी सुसज्जित पुस्तकालय एवं प्रयोगशालाओं की आवश्यकता पड़ती है।




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