16 September 2017

डर क्या है और डर के प्रकार What is Fear and Kinds of Fear

आज हम डर/भय के बारे में जानेंगे डर क्या है-
हर व्यक्ति अलग-अलग तरीके से डर का अनुभव करता है अप्रिय होने की भावना से खतरे की भावना से या वस्तविक डर की भावना से ।
डर मानव तक ही सिमित नही है अपितु सभी प्राणियों में होता है।इस डर से व्यक्ति या अन्य प्राणी इस धरती पर अपने अस्तित्व की रक्षा करते है।
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   डर का सम्बन्ध खुद की पहचान से होता है।जो व्यक्ति स्वयं में अधिक विश्वास रखता है वः डर को अपनी सोचने की शक्ति से सरलता से नियंत्रित कर लेता है।डर जीवन में होने वाली कई घटनाओं से जन्म लेता है।जहाँ डर नकारात्मक सोच से आता है वहाँ स्थति अधिक अनियंत्रित होती है।जैसे-यदि में सरकारी नोकरी नही प्राप्त कर पाता तो मेरे परिवार वाले मुझसे खुश नही होंगे, मेरे और उनके सपने अधूरे रह जाएंगे।
गांधीजी ने डर को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया है कि"हम घृणा को शत्रु मानते है लेकिन वास्तव में घृणा नही बल्कि डर हमारा शत्रु है।"


डर के प्रकार(Kinds of Fear)-
    भय/डर कई प्रकार के होते है जिनमे से कुछ नीचे दिए गए है-

1.काल्पनिक डर-
        अनहोनी,अनिष्ट बुरी बातों की थोथी कल्पनाएं दुसरो की बुरी हालत देखकर स्वयं अपने लिए वैसी ही परिस्थतियो को स्मृति पटल पर बार बार लाना,अपनी व्याधियों को कल्पित जगत में उद्दीप्त करके देखना ,अनुचित बातों से कल्पना लोक में सामंजस्य स्थापित करना काल्पनिक भय के मुख्य कारण है।रात-दिन जो व्यक्ति दुःख,शोक, रोग की कल्पनाओं से आच्छादित है वे काल्पनिक भय का चिंतन किया करते है।

2.वास्तविक डर-
        व्यक्ति जब किसी वास्तविक वस्तु से भयभीत होता है तो कुछ समय के लिए उसके हाथ-पैर फूल जाते है।कुछ समय के लिए संपूर्ण शरीर आंदोलित हो जाता है।वास्तविक भय का प्रभाव विशेषत: ह्रदय पर पड़ता है जिसके फलस्वरूप वह निज कार्य यथोचित प्रकार से नही कर पता है।
उदाहरण-मनुष्य के सामने अचानक शेर या चीता आ जाये तो वह वास्तविक भय से भयभीत हो जाता है।

3.घटना से भय- 
       व्यक्ति के साथ कोई विशेष घटना घटित हो जाती है तो उसके मन एवं ह्रदय में एक तरह का डर पैदा हो जाता है कि ऐसी दुर्घटना दोबारा न घटे।हर समय व्यक्ति के मन में घटना से उतपन्न होने वाला डर बना रहता है।

4.असफल होने का भय-
      मनुष्य दो चार बार किसी कार्य में फेल हो जाता है तो उसके अंदर निराशा उत्पन्न हो जाती है और उसे चारों और अंधकार ही अंधकार नजर आता है। असफलता का डर एक प्रकार के भयंकर राक्षस के समान है असफलता के डर से ग्रसित व्यक्ति हमेशा बुराई की तरफ देखता है तथा असफलता के वचन ही उच्चारित किया करता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा के लिए अपने अहित की, संकीर्णता कि, असिद्धि की ही बात सोचता है।


5. अस्तित्व बनाए रखने का डर-
     वर्तमान समय में मनुष्य अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश करता है। अस्तित्व को बनाए रखने के लिए मनुष्य के जीवन में स्थिरता तथा शांति नहीं है फिर भी उन्हें अपने अस्तित्व के हनन का डर बना रहता है साथ ही सभी जीवो में इस डर प्रक्रिया चलती रहती है।

6. कुछ खो देने का डर-
      विश्व में प्रत्येक व्यक्ति प्राय किसी न किसी रूप में डर से ग्रस्त है कुछ व्यक्तियों को अपना कुछ खो देने का डर रहता है जैसे छोटे बच्चे को अपनी माता पिता से बिछुड़ने का डर रहता है। छात्रों को अपने सहपाठी छात्र से दूर होने का डर रहता है व्यापारी को अपने व्यापार में घाटे का डर रहता है इसी तरह सभी क्यों को कुछ न कुछ खोने का डर रहता है।

7. अवचेतन मन से जनित डर-
      जब मनुष्य के मन में कोई डर अवचेतन रुप से बैठ जाता है तो हमेशा उसके मन में डर बना रहता है वह उस डर से डरा रहता है जिसे व्यक्ति सोते समय कोई अनहोनी घटना को सपने में देखता है तो वह उस डर से हमेशा डरा रहता है कि कहीं वास्तव में ऐसा हो जाए।

8. बहिष्कार का डर-
      मानव सामाजिक प्राणी है वह समाज में रहता है । बहिष्कार के डर को एक प्रकार का सामाजिक डर भी कह सकते हैं इस प्रकार के डर में व्यक्ति को समाज के लोगों से डर लगा रहता है कि उसकी द्वारा किसी प्रकार की गलती हो जाने पर समाज द्वारा उसे बहिस्कृत न कर दिया जाए। छात्रों को अनुशासनहीनता करने पर कक्षा या विद्यालय से विस्तृत होने का डर बना रहता है तथा किसी मंत्री को सभा से बहिस्कृत होने का भय बना रहता है।

9. विलुप्त होने का डर-
     कुछ लोगों को विलुप्त होने का डर रहता है। डर शंका का गढ़ है। डर के कारण मस्तिष्क की कार्यवाहीनी शक्ति विकृत या संकुचित हो जाती है जिससे व्यक्ति में अपने लिए कुछ मनो ग्रंथियां बन जाती है अतः कुछ मनुष्य के भीतर एक प्रकार का विलुप्त होने का डर कभी-कभी पैदा होता है।
10. अनिश्चितता का डर-
      कुछ लोग कुत्सित मानसिक दुर्बलता से ग्रसित होते हैं ऐसे लोग प्रत्येक कार्य अनिश्चित या संदिग्ध दिमाग से करते हैं मनोवैज्ञानिको का निष्कर्ष है की अनिश्चितता जन्म जात गुण नहीं है यह एक तरह की आदत होती है अनिश्चितता निराशा बाद के साथ-साथ रहती है ।ऐसे व्यक्ति अपने किसी भी कार्य को निश्चित समय पर संपन्न नहीं कर पाते हैं हमेशा अनिश्चितता से डर से ग्रसित रहते हैं।

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