03 अप्रैल 2020

समाज व विद्यालय में संबंध Relation between school and Society

समाज व विद्यालय में संबंध की आवश्यकता क्यों है पहले हम इसके बारे में जानेंगे-
        विद्यालय और समाज शिक्षा की महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं इसलिए दोनों में गहरा संबंध है विद्यालय यदि औपचारिक संस्था का उदाहरण है तो वहीं पर समाज अनौपचारिक शिक्षा का।
वर्तमान परिस्थितियों में विद्यालय एवं समाज के बीच संबंधों को बढ़ाने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है जिसके कुछ कारण इस प्रकार हैं-
 1. विद्यालय समाज द्वारा स्थापित संस्थाएं हैं अतः समाज की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक आवश्यकताएं प्रतिबिंबित होनी चाहिए। विद्यालय द्वारा दी जाने वाली शिक्षा समाज की इन आवश्यकता व अपेक्षाओं को पूरा करने वाली होनी चाहिए।
2. विद्यालय में दी जाने वाली पुस्तक की शिक्षा तभी सार्थक है जब उनमें मिले अनुभवों को वास्तविक जीवन से जोड़ा जाए। बच्चे स्वयं चीजों को देखें, स्पर्श करें, महसूस करें उन्हें जाने।
3. विद्यालय को छोटा समाज कहा जाता है क्योंकि यह समाज द्वारा ही निर्मित होती है अतः विद्यालय को चाहिए कि वह बच्चों की वास्तविक जीवन के अनुभव से परिचित कराएं।
4. शिक्षा का उद्देश्य बच्चे में समायोजन की योग्यता का विकास करना है। ऐसा विद्यालय एवं समाज के संबंध बिना संभव नहीं है।
Relation between school and Society

विद्यालय और समाज में संबंध (collaboration between school and Society)-

   इन दोनों के बीच अंतर को दो बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है-
1 समाज का विद्यालय पर प्रभाव
2 विद्यालय का समाज पर प्रभाव

1. समाज का विद्यालय पर प्रभाव (impact of society on school)-

 समाज विद्यालय को निम्न रूपों में प्रभावित करता है- 
1. सांस्कृतिक प्रभाव (cultural influence)-
      विद्यालय शिक्षा के उद्देश्य व पाठ्यक्रम समाज की संस्कृति से प्रभावित होते हैं जिसमें वह स्थित है। यही नहीं, पूरे विद्यालय परिवेश में उस समाज की संस्कृति प्रतिबिंबित होती है। भारतीय शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में विश्व बंधुत्व की भावना तथा सामाजिक, नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना है। पाठ्यक्रम में नैतिक बम मूल्य शिक्षा को तो रखा ही गया है विभिन्न विषयों में इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक विषय सामग्री को भी स्थान दिया गया है।

2. राजनीतिक प्रभाव(political influence)-
      समाज की राजनीतिक विचारधारा विद्यालय शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, अनुशासन व प्रशासन को प्रभावित करती है। प्रजातांत्रिक समाज होने के कारण भारतीय विद्यालय प्रजातांत्रिक नागरिकता व नेतृत्व के विकास के लिए प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। वहां के अनुशासन, प्रशासन व पाठ्यक्रम पर भी इसकी छाप दिखाई देती है।

3. आर्थिक प्रभाव (economic influence)-
       यदि समाज की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तो वहां के विद्यालय से भी सुविधाओं से संपन्न होते हैं। यदि आर्थिक स्थिति कमजोर होती है तो विद्यालय इन सुविधाओं से वंचित रहते हैं। यही नहीं समाज की आर्थिक स्थिति शिक्षा के उद्देश्यों हुए पाठ्यक्रम पर भी प्रभाव डालती है। भारत में शिक्षा का उद्देश्य आर्थिक विकास है और कृषि प्रधान देश होने के कारण यहां कृषि को विद्यालय पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया है। बेरोजगारी जैसी समस्याओं के समाधान के लिए शिक्षा को व्यवसायिक रूप प्रदान किया जा रहा है। स्पष्ट है कि समाज को आर्थिक स्थिति का विद्यालय पर प्रभाव पड़ता है।

4. सामाजिक प्रभाव (social influence)-
      विद्यालय में दी जाने वाली शिक्षा सामाजिक समस्याओं के समाधान व सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन होती है। अतः विद्यालय पाठ्यक्रम में इसी विषय सामग्री को स्थान दिया जाता है जो इसमें सहायक होती है। भारतीय विद्यालयों के पाठ्यक्रम में सामाजिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों, बढ़ती जनसंख्या, प्रदूषण तथा सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं को दूर करने में सहायक विषय सामग्री को रखा गया है। यही नहीं,भारत जिन धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के कारण विश्व में अपना अलग स्थान बनाए हुए हैं उन मूल्यों पर आधारित विषय सामग्री भी इसमें शामिल है।
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि विद्यालय समाज का प्रतिबिंब होता है।

2. विद्यालय का समाज पर प्रभाव (impact of school on society)-

    विद्यालय समाज को निम्नलिखित रूपों में प्रभावित करता है-
1. संस्कृति की सुरक्षा एवं विकास (Preservation and Development of culture)-
किसी भी समाज की संस्कृति तभी जीवित रहती है जब वह आने वाली पीढ़ी तक पहुंचती रहे। यह कार्य विद्यालय ही करते हैं। विद्यालय बच्चों को विश्व की विभिन्न संस्कृतियों से भी परिचित कराते हैं जिससे वह कुछ नई बातें अपनी संस्कृति में जोड़कर उसका विकास कर सके। वे उनमें विश्लेषण की योग्यता का विकास भी करते हैं जिससे वे अपनी संस्कृति से उन बातों को निकाल सके जो अप्रसांगिक हो गई है।

2. समाज का आर्थिक विकास (economic development of society)-
   विद्यालय विभिन्न क्षेत्रों में कुशल जनशक्ति का निर्माण करते हैं जिससे उत्पादन में गुणात्मक व परिमाणात्मक सुधार होता है और समाज का आर्थिक विकास होता है। यही नहीं, विद्यालय व्यक्तियों में व्यवसायिक कुशलता का भी विकास करते हैं जिससे वह अपनी आजीविका स्वयं कमाने के योग्य बन सके।

3. सामाजिक परिवर्तन(social change)-
     समाज की प्रगति के लिए नवीन सामाजिक परिवर्तनों को स्वीकारना आवश्यक है।विद्यालय विद्यार्थियों में नवीन सोच का विकास करते हैं उनकी रूढ़िवादिता व अंधविश्वासों को दूर करते हैं तथा उनके दृष्टिकोण को आधुनिक बनाते हैं। इस प्रकार विद्यालय समाज में परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

4. सामाजिक प्रगति (social progress)-
     विद्यालय समाज को शिक्षा, उद्योग, चिकित्सा,प्रबंधन तथा अन्य क्षेत्रों में प्रतिभा संपन्न व्यक्ति उपलब्ध कराते हैं जिससे समाज को प्रगति की ओर अग्रसर होने में मदद मिलती है।

5. समाज की समस्याओं के समाधान में मदद-
       विद्यालय विभिन्न विषयों को पाठ्य सामग्री व अन्य गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूकता उत्पन्न करते हैं जिससे समाज को उनका समाधान करने में मदद मिलती है। भारत में विद्यालय समाज में फैली सांप्रदायिकता, प्रदूषण, मूल्य में आ रही गिरावट तथा बढ़ती जनसंख्या जैसी समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

6. समाज की आवश्यकताओं को पूरा करना-
      समाज की सामाजिक आर्थिक राजनीतिक तथा सांस्कृतिक आदि सभी प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने में विद्यालय ही मदद करते हैं।

7. समाज की राजनीतिक स्वरूप के अनुरूप आदर्श नागरिक तैयार करते हैं। किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि उसके नागरिक वैसे ही बने जैसा वह चाहते हैं।तानाशाही व्यवस्था में अनुशासित व आज्ञाकारी नागरिकों की आवश्यकता होती है तो प्रजातंत्र ऐसे नागरिक जाता है जिनमें स्वतंत्र रूप से सोचने व निर्णय लेने की योग्यता हो तथा जो अपने अधिकारों व कर्तव्यों को समझते हो।
ऐसे ही अन्य राजनीतिक व्यवस्थाओं में आदर्श नागरिकता के मापदंड अलग अलग है। विद्यालय समाज के राजनीतिक स्वरूप के अनुरूप अच्छे नागरिकों को तैयार करने का कार्य करते हैं।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर स्पष्ट है की विद्यालय व समाज एक दूसरे की पूरक एवं सहयोगी हैं। दोनों का परस्पर सहयोग इन्हें शिक्षा की प्रभावशाली संस्था बनाने में मदद करता है। पर यदि वस्तु स्थिति पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि वर्तमान स्थिति में इनका परस्पर संबंध अधिक प्रभावशाली नहीं है। इनमें परस्पर दूरियां बढ़ती जा रही है अतः इनके संबंध को सुधारना आवश्यक है।




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